उत्तराखंड-हिमाचल में भारी बारिश का कहर: 101 साल का रिकॉर्ड टूटा, गांव तबाह और सैकड़ों प्रभावित
सितंबर का महीना उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के लोगों के लिए भारी तबाही लेकर आया है। पहाड़ों पर हो रही लगातार बारिश ने कई वर्षों पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं और इस आपदा ने लोगों की जिंदगी को बुरी तरह से प्रभावित किया है। देहरादून में सोमवार रात हुई बारिश ने पिछले 101 सालों का रिकॉर्ड तोड़ दिया, वहीं हिमाचल प्रदेश में इस बार के मानसून ने 88 साल का रिकॉर्ड तोड़ा। भारी बारिश से सड़कों का टूटना, पुल बह जाना, घर गिर जाना और गांव के गांव उजड़ जाना जैसे भयावह दृश्य देखने को मिले। हजारों लोग बेघर हो गए हैं और कई परिवार अपने अपनों को खो चुके हैं। पहाड़ी इलाकों में लगातार हो रही बारिश से भूस्खलन का खतरा और बढ़ गया है। जगह-जगह सड़कें बंद हैं, जिससे राहत और बचाव कार्यों में भी दिक्कतें आ रही हैं। उत्तराखंड और हिमाचल जैसे राज्यों की भौगोलिक स्थिति वैसे ही चुनौतीपूर्ण है, और जब इस तरह की आपदाएं आती हैं तो उनका असर और भी गहरा हो जाता है।
इस आपदा के बीच सवाल उठने लगे हैं कि आखिर प्रकृति इतनी नाराज़ क्यों है। विशेषज्ञों का मानना है कि अनियंत्रित विकास, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, सुरंगों और सड़कों का बेतहाशा निर्माण और वनों की कमी ने प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है। पहाड़ों की स्थिरता को बार-बार चुनौती देने के कारण वहां की मिट्टी और चट्टानें कमजोर हो गई हैं। ऐसे में जब लगातार बारिश होती है तो भूस्खलन और बाढ़ जैसी घटनाएं बार-बार सामने आती हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पिछले कुछ सालों से आपदाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है और सरकार विकास के नाम पर पहाड़ों का शोषण कर रही है। यहां तक कि कई धार्मिक और पर्यटन परियोजनाओं ने भी पहाड़ों की स्थिरता को प्रभावित किया है। इन सबके बीच आम जनता सबसे ज्यादा पीड़ित हो रही है, जिन्हें अपनी जान, घर और रोजगार तीनों का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
बारिश और तबाही के आंकड़े भी स्थिति की गंभीरता को बयां करते हैं। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के अनुसार, पिछले आठ वर्षों में राज्य में 26,700 से ज्यादा आपदा की घटनाएं दर्ज की गई हैं। यह संख्या बताती है कि यहां आपदाएं अब अपवाद नहीं बल्कि सामान्य सी घटना बन चुकी हैं। हर साल बाढ़, भूस्खलन और भारी बारिश की वजह से सैकड़ों लोगों की जान चली जाती है और हजारों परिवार प्रभावित होते हैं। हिमाचल प्रदेश में भी हालात कुछ अलग नहीं हैं। यहां भी इस बार की बारिश ने दशकों पुराने रिकॉर्ड तोड़े हैं और नदियां उफान पर हैं। कई जगह बांधों का पानी छोड़ा गया है, जिससे निचले इलाकों में रहने वालों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। सरकार और प्रशासन लगातार राहत और बचाव कार्य में जुटा है, लेकिन मुश्किलें इतनी बड़ी हैं कि तुरंत राहत देना आसान नहीं है। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ और सेना की टीमें लगातार प्रभावित इलाकों में मदद कर रही हैं, फिर भी पीड़ा इतनी गहरी है कि लोगों का गुस्सा और आक्रोश समझ में आता है।
इन सबके बीच पहाड़ों के लोग अब इसे सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं मानते। उनका कहना है कि यह मानवजनित आपदा है, जो हमारे ही गलत फैसलों का नतीजा है। अनियंत्रित निर्माण, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और पर्यावरण की अनदेखी ने आज इस हालत में पहुंचा दिया है। कई लोग इसे ईश्वर का कोप मानते हैं और दुआ कर रहे हैं कि अब प्रभु रहम करें। एक व्यक्ति ने भावुक होकर कहा, “अब बस करो ये बाढ़, बारिश और बर्बादी। बहुत नुकसान हो गया, अब और सहा नहीं जाता।” यह बात उस पीड़ा और हताशा को बयां करती है जो आम जनता महसूस कर रही है। विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर अभी भी सरकार और समाज ने सबक नहीं लिया तो आने वाले सालों में ऐसी आपदाएं और ज्यादा भयानक रूप ले सकती हैं। पहाड़ों का संतुलन बनाए रखना जरूरी है, नहीं तो हर साल यही कहानी दोहराई जाएगी। यह वक्त है जब सरकार को विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना होगा, वरना आने वाली पीढ़ियां भी इस संकट का खामियाजा भुगतेंगी।


