बिहार चुनाव 2025: सीटों को लेकर बढ़ी खींचतान, चिराग पासवान और मांझी ने दिखाया सख्त रुख
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 से पहले सूबे की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। पटना से दिल्ली तक सियासी गलियारों में गहमागहमी बढ़ती जा रही है। एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (BJP) की चुनाव समिति की अहम बैठक पटना में चल रही है, वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व दिल्ली में बैठकर बिहार चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची को अंतिम रूप देने में जुटा है। एनडीए और महागठबंधन दोनों खेमों में सीट बंटवारे को लेकर चर्चाएं तेज हैं। सूत्रों के मुताबिक, कई सीटों पर दावेदारी को लेकर छोटे सहयोगी दलों ने असंतोष जताया है। खासकर एनडीए के भीतर लोक जनशक्ति पार्टी (LJP-RV) और हम (Hindustani Awam Morcha) जैसे सहयोगी दलों की मांगें भाजपा के लिए चुनौती बनती दिख रही हैं। पटना में नेताओं की लगातार बैठकों और दिल्ली में रणनीतिक चर्चाओं से यह साफ संकेत मिल रहे हैं कि बिहार में इस बार का चुनाव बेहद कड़ा और बहु-कोणीय होगा। बिहार की राजनीति में गठबंधन की गुत्थी सुलझाना हमेशा मुश्किल रहा है, और इस बार भी यह समीकरण तय करने में सभी दलों को माथापच्ची करनी पड़ रही है।
चिराग पासवान ने अपने पिता रामविलास पासवान की पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि देते हुए न केवल भावनात्मक संदेश दिया, बल्कि राजनीतिक संदेश भी साफ कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “25 सीटों पर मानने वाला सवाल ही नहीं उठता।” चिराग ने कहा कि वे गठबंधन की मजबूती चाहते हैं, लेकिन अपनी पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के सम्मान और अस्तित्व से कोई समझौता नहीं करेंगे। चिराग ने अपने पिता की पंक्तियाँ उद्धृत करते हुए कहा — “जुर्म करो मत, जुर्म सहो मत, जीना है तो मरना सीखो, कदम कदम पर लड़ना सीखो।” यह बयान न केवल भावनात्मक था बल्कि राजनीतिक तौर पर भी बेहद अहम संदेश देता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि वे बिहार में एक मजबूत और स्वतंत्र पहचान बनाना चाहते हैं। चिराग पासवान पहले भी सीट बंटवारे में सम्मानजनक हिस्सेदारी की मांग करते रहे हैं। माना जा रहा है कि वे अपने प्रभाव वाले इलाकों जैसे जमुई, खगड़िया, और समस्तीपुर में अपनी उपस्थिति को मजबूती देना चाहते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि गठबंधन में बातचीत जारी है और जल्द ही सब कुछ स्पष्ट कर दिया जाएगा। उनके इस रुख से यह संकेत मिलता है कि बिहार की राजनीति में चिराग पासवान अब “किंगमेकर” की भूमिका में खुद को स्थापित करना चाहते हैं।
वहीं दूसरी तरफ, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी और उनकी पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) ने भी सीट बंटवारे को लेकर असंतोष जताया है। मांझी ने कहा कि उनकी पार्टी को “मान्यता प्राप्त दल” के तौर पर सम्मानजनक सीटें मिलनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि “हम किसी गठबंधन के शोपीस नहीं हैं, हम जनता के बीच काम करने वाले दल हैं।” इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में एक नई चर्चा शुरू हो गई है कि क्या मांझी गठबंधन से अलग हो सकते हैं। उन्होंने 10 अक्टूबर को अपनी पार्टी की पार्लियामेंट्री बोर्ड की बैठक बुलाई है, जिसमें भविष्य की रणनीति तय की जाएगी। मांझी के इस रुख से भाजपा पर दबाव बढ़ना तय है क्योंकि एनडीए पहले ही कई मोर्चों पर आंतरिक मतभेदों का सामना कर रहा है। दूसरी ओर, महागठबंधन में भी कांग्रेस और राजद (RJD) के बीच सीट बंटवारे पर गहमागहमी जारी है। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक, वे 50 सीटों पर उम्मीदवारों के नाम फाइनल कर रहे हैं। इस तरह बिहार का राजनीतिक परिदृश्य इन दिनों पूरी तरह से सीटों की गणित और गठबंधन की राजनीति में उलझा हुआ है।
इस पूरे राजनीतिक माहौल के बीच, एनडीए के केंद्रीय प्रभारी केशव प्रसाद मौर्य ने बयान जारी करते हुए कहा है कि “गठबंधन के भीतर सब कुछ ठीक-ठाक है और जल्द ही सीटों पर अंतिम फैसला हो जाएगा।” मौर्य ने बताया कि भाजपा का उद्देश्य सभी सहयोगी दलों को साथ लेकर चुनाव लड़ना है ताकि बिहार में एनडीए की दोबारा मजबूत वापसी सुनिश्चित की जा सके। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बिहार के विकास कार्यों का लाभ जनता तक पहुंचा है और इस बार का चुनाव “काम और विकास” के मुद्दों पर लड़ा जाएगा। हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अंदरखाने में मतभेद अब भी मौजूद हैं। भाजपा अपने सहयोगियों को सीमित सीटें देना चाहती है जबकि छोटे दल अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में आने वाले कुछ दिन बिहार के राजनीतिक समीकरण तय करने में निर्णायक साबित होंगे। एक तरफ महागठबंधन अपनी एकजुटता दिखाने की कोशिश में है, वहीं एनडीए को अपने भीतर के मतभेद सुलझाने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। फिलहाल, पटना से लेकर दिल्ली तक हर राजनीतिक कदम पर नजरें टिकी हैं क्योंकि अगली घोषणा से बिहार के चुनावी दांव पूरी तरह बदल सकते हैं।


