नेपाल में भारी वर्षा से बिहार में बाढ़ का कहर: कोसी नदी उफान पर, 5 जिलों में तबाही और चुनावी मुश्किलें बढ़ीं
नेपाल में लगातार हो रही तेज़ वर्षा ने बिहार के उत्तरी जिलों में एक बार फिर बाढ़ का कहर ला दिया है। विशेष रूप से कोसी नदी का जलस्तर खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है, जिसके बाद प्रशासन ने कोसी बैराज के सभी 56 गेट खोल दिए हैं। पिछले 24 घंटों में 5,50,000 क्यूसेक से अधिक पानी छोड़े जाने से हालात और बिगड़ गए हैं। अररिया, सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जैसे जिले पूरी तरह से बाढ़ की चपेट में हैं। ग्रामीण इलाकों में घरों में पानी घुस गया है, सड़कें टूट चुकी हैं और पुलिया बह गई हैं। प्रशासन लगातार राहत और बचाव कार्य में जुटा हुआ है, लेकिन तेज़ बहाव और लगातार बारिश राहत कार्यों में बाधा बन रही है। कई जगहों पर नावों के जरिए लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है, वहीं कई लोग ऊंचे स्थानों पर शरण लेकर किसी तरह जिंदगी बचा रहे हैं। बाढ़ के पानी ने खेतों को भी तबाह कर दिया है, जिससे किसानों को भारी नुकसान हुआ है।
बाढ़ की यह त्रासदी ऐसे समय में आई है जब बिहार में चुनावों की घोषणा हो चुकी है। अब यह स्थिति चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। जिन जिलों में पानी भर गया है, वहां मतदान केंद्र स्थापित करना और मतदान प्रक्रिया को सुरक्षित तरीके से पूरा करना बेहद कठिन कार्य साबित हो सकता है। अधिकारियों का कहना है कि बाढ़ग्रस्त इलाकों में चुनाव कराना फिलहाल जोखिम भरा है, लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया के चलते आयोग को विकल्प तलाशने होंगे। दूसरी ओर, स्थानीय प्रशासन राहत शिविरों की संख्या बढ़ा रहा है, लेकिन भीड़ इतनी अधिक है कि सुविधाएं अपर्याप्त साबित हो रही हैं। राहत सामग्री, भोजन, स्वच्छ पेयजल और दवाइयों की कमी से लोगों की स्थिति गंभीर हो गई है। वहीं, राजनीतिक दलों ने भी बाढ़ को लेकर सरकार पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि हर साल नेपाल की वर्षा के बाद बिहार के सीमावर्ती जिलों में यही स्थिति बनती है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
बाढ़ प्रभावित इलाकों से आ रही तस्वीरें और आवाज़ें बेहद दिल दहला देने वाली हैं। एक स्थानीय निवासी ने कहा, “हम लोग के पास अब रहने का जगह नहीं है, ऊंचा जमीन पकड़ के बाल-बच्चा के साथ खड़े हैं, और खाने के लिए कोई अनाज नहीं बचा।” यह बयान बिहार के हजारों परिवारों की वास्तविक स्थिति को बयां करता है। बाढ़ से कई गांवों का संपर्क पूरी तरह टूट गया है, मोबाइल नेटवर्क और बिजली की सप्लाई भी बंद है। स्कूली बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग सबसे अधिक प्रभावित हैं। कई लोगों ने अपने घर और मवेशी दोनों खो दिए हैं। राहत शिविरों में भी भीड़ बढ़ने के कारण स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। डेंगू और मलेरिया जैसी बीमारियों का खतरा मंडरा रहा है। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें लगातार रेस्क्यू अभियान चला रही हैं, लेकिन लगातार बारिश और तेज़ धारा राहत कार्य में सबसे बड़ी बाधा बन रही है।
इधर, सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि उत्तरी बंगाल में भी स्थिति बेहद भयावह है। लगातार वर्षा और भूस्खलन से जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब तक 23 लोगों की मृत्यु हो चुकी है, जिनमें से 18 दार्जिलिंग जिले के हैं। दार्जिलिंग के सोरेनी गांव में एक ही परिवार के चार सदस्य मलबे में दबकर जान गंवा बैठे। प्रशासन ने प्रभावित इलाकों में अलर्ट जारी किया है और पहाड़ी रास्तों को बंद कर दिया गया है। दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और सिलीगुड़ी में भूस्खलन से सड़कों और घरों को भारी नुकसान पहुंचा है। मौसम विभाग ने अगले 48 घंटों तक और बारिश की चेतावनी दी है। ऐसे में बिहार और बंगाल दोनों राज्यों में राहत कार्यों पर दबाव बढ़ गया है। यह प्राकृतिक आपदा न केवल प्रशासनिक चुनौती पेश कर रही है, बल्कि मानवता की परीक्षा भी बन गई है। दोनों राज्यों की सरकारें लगातार केंद्र से अतिरिक्त सहायता की मांग कर रही हैं ताकि प्रभावित इलाकों में राहत और पुनर्वास का काम तेज़ी से आगे बढ़ाया जा सके।


