महाराष्ट्र में बीएमसी चुनाव से पहले बढ़ी सियासी गर्मी, रवि राजा ने उठाए चुनाव आयोग पर सवाल
महाराष्ट्र में महानगरपालिका चुनावों की घोषणा भले ही अभी आधिकारिक रूप से नहीं हुई हो, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसकी आहट साफ़ सुनाई दे रही है। राज्य की राजनीति में बीएमसी (बृहन्मुंबई महानगरपालिका) का चुनाव हमेशा से सबसे अहम माना जाता रहा है, क्योंकि यह न केवल देश की सबसे धनी नगरपालिका है बल्कि यहां का परिणाम राज्य की राजनीतिक दिशा भी तय करता है। इसी को ध्यान में रखते हुए तमाम राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारी तेज कर दी है। मुंबई भाजपा उपाध्यक्ष रवि राजा ने हाल ही में दावा किया कि आगामी महानगरपालिका चुनावों में “बीजेपी महायुति” की सत्ता को कोई नहीं रोक सकता। उनका यह बयान न केवल भाजपा के आत्मविश्वास को दर्शाता है बल्कि यह भी बताता है कि बीजेपी-शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) और एनसीपी (अजित पवार गुट) के गठबंधन ने चुनावी रणनीति को लेकर पूरी ताकत झोंक दी है। दूसरी ओर, उद्धव ठाकरे गुट और कांग्रेस इस चुनाव को ‘जनता की आवाज़ बनाम सत्ता की राजनीति’ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में, यह साफ़ है कि मुंबई की सियासत आने वाले महीनों में बेहद गर्म रहने वाली है।
रवि राजा ने अपने बयान में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बीते एक साल से नए वोटर्स के रजिस्ट्रेशन के लिए वेबसाइट खुली ही नहीं है, जिसके कारण मुंबई के करीब 1,79,000 युवा वोट नहीं बना पा रहे हैं। यह संख्या बहुत बड़ी है और यदि यह सच है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े होते हैं। युवा मतदाता हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं — खासकर महानगरों में, जहां शिक्षा, रोजगार और बुनियादी ढांचे के मुद्दे सबसे ज़्यादा प्रभाव डालते हैं। बीजेपी का यह आरोप चुनाव आयोग पर दबाव बनाने का एक तरीका भी हो सकता है, ताकि विपक्ष को यह संदेश दिया जा सके कि बीजेपी न केवल चुनावी तैयारी में आगे है बल्कि पारदर्शिता की मांग भी कर रही है। हालांकि विपक्षी दलों का कहना है कि यह “राजनीतिक प्रोपेगेंडा” है और बीजेपी खुद चाहती है कि नए मतदाता, जो अधिकतर विपक्षी विचारधारा के हैं, वोट न डाल सकें। चुनाव आयोग ने इस मामले पर अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिससे राजनीतिक बयानबाज़ी और तेज़ हो गई है।
मुंबई महानगरपालिका चुनाव केवल स्थानीय निकाय का चुनाव नहीं है — यह महाराष्ट्र की सत्ता संतुलन का केंद्र है। बीएमसी का सालाना बजट कई छोटे राज्यों के कुल बजट से बड़ा होता है, ऐसे में इस संस्था पर कब्ज़ा राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण है। लंबे समय तक बीएमसी पर शिवसेना (उद्धव ठाकरे) का नियंत्रण रहा है, लेकिन 2017 के बाद से बीजेपी ने उसमें सेंध लगाई और अब पूरा कब्ज़ा करने की दिशा में बढ़ रही है। बीजेपी के लिए यह चुनाव “मराठी अस्मिता बनाम विकास की राजनीति” का संगम साबित हो सकता है, जबकि शिवसेना (उद्धव गुट) इसे “धोखे और बगावत” के खिलाफ जनादेश बताने की कोशिश करेगा। एनसीपी (अजित पवार गुट) और अन्य सहयोगी दल भी अपने-अपने स्तर पर स्थानीय वोट बैंक को साधने की कोशिश में हैं। बीएमसी की लगभग 227 सीटों पर होने वाला यह चुनाव, मुंबई के अलावा पूरे महाराष्ट्र में राजनीतिक समीकरणों को बदलने की ताकत रखता है। इसलिए हर दल इस चुनाव को ‘प्रतिष्ठा की लड़ाई’ मानकर चल रहा है।
चुनावी सरगर्मियों के बीच सबसे अहम सवाल यह है कि मुंबई की जनता इस बार क्या सोच रही है? बीएमसी में लंबे समय से भ्रष्टाचार, सफाई व्यवस्था, ट्रैफिक और जल निकासी जैसे मुद्दे बने हुए हैं, जिन पर नागरिक लगातार नाराजगी जताते रहे हैं। महायुति गठबंधन विकास और पारदर्शिता के नाम पर वोट मांग रही है, जबकि महाविकास अघाड़ी (शिवसेना-उद्धव, कांग्रेस, एनसीपी-शरद पवार) इसे “जनता बनाम सत्ता” की लड़ाई बता रही है। युवा मतदाताओं की भूमिका इस बार बेहद निर्णायक होगी, खासकर यदि रजिस्ट्रेशन में अड़चनों का समाधान होता है। सामाजिक मीडिया पर चल रही मुहिमों से यह भी स्पष्ट है कि मुंबई का पढ़ा-लिखा वर्ग अब पारदर्शिता, जवाबदेही और कामकाज के आधार पर वोट देना चाहता है, न कि केवल जाति या क्षेत्रीय भावनाओं पर। इसलिए यह चुनाव न केवल दलों की परीक्षा है, बल्कि लोकतंत्र की विश्वसनीयता की भी कसौटी होगा। आने वाले कुछ हफ्तों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या भाजपा महायुति अपनी “विकास राजनीति” की धार बनाए रख पाती है या शिवसेना-उद्धव गुट अपनी “भावनात्मक जुड़ाव” से जनता को फिर से अपने साथ जोड़ पाता है।


