हिमालयी राज्यों में भारी बारिश और भूस्खलन से हाहाकार — दार्जिलिंग में टूटा 26 साल का रिकॉर्ड, उत्तराखंड-हिमाचल में तबाही
हिमालयी राज्यों में भारी बारिश, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं ने एक बार फिर से प्राकृतिक आपदा की भयावहता को उजागर कर दिया है। जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में भी हालात बेहद गंभीर हैं। मौसम विभाग के अनुसार, दार्जिलिंग में शनिवार रात से हुई बारिश ने पिछले 26 वर्षों का रिकॉर्ड तोड़ दिया, जहाँ मात्र 24 घंटों में 16 इंच वर्षा दर्ज की गई। यह 1998 के बाद पहली बार है जब इस क्षेत्र में इतनी अधिक वर्षा हुई है। लगातार वर्षा के कारण कई इलाकों में नदी-नालों का जलस्तर तेजी से बढ़ गया, जिससे निचले क्षेत्रों में बाढ़ की स्थिति बन गई। स्थानीय प्रशासन ने राहत और बचाव कार्य तेज कर दिए हैं, लेकिन सड़कों और पुलों के क्षतिग्रस्त होने से कई जगहों पर संपर्क टूट गया है। दार्जिलिंग से सिलीगुड़ी को जोड़ने वाला मुख्य पुल ढह गया, जिससे सैकड़ों वाहन रास्ते में फँस गए। लोगों को ऊँचे इलाकों में शरण लेनी पड़ी। कई जगहों पर बिजली व्यवस्था ठप हो गई है और मोबाइल नेटवर्क भी प्रभावित है, जिससे लोगों के बीच भय का माहौल बना हुआ है।
प्रभावित इलाकों से आने वाली तस्वीरें और वीडियो दिल दहला देने वाले हैं। कई परिवारों के घर नदी के तेज बहाव में बह गए हैं। कुछ लोगों ने बताया कि पानी का स्तर इतना बढ़ गया था कि वे अपने घरों तक नहीं पहुँच पाए। राहत कार्यों में राज्य आपदा प्रबंधन दल (SDRF), राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (NDRF) और स्थानीय प्रशासन जुटा हुआ है। हेलीकॉप्टर की मदद से फँसे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया जा रहा है। हालांकि, लगातार हो रही बारिश के कारण बचाव कार्यों में बाधा आ रही है। हिमाचल प्रदेश में 30 से अधिक सड़कों पर भूस्खलन के कारण यातायात ठप है, जबकि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों में कई गांव अब भी बाहरी संपर्क से कटे हुए हैं। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने अगले 24 घंटों में दार्जिलिंग, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में भारी बारिश की चेतावनी जारी की है। अधिकारियों ने नागरिकों से अपील की है कि वे नदी किनारे या भूस्खलन-प्रवण क्षेत्रों में न जाएँ। कई स्कूल बंद कर दिए गए हैं और यात्रियों को पहाड़ी मार्गों से यात्रा न करने की सलाह दी गई है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड का लगभग 22 प्रतिशत हिस्सा उच्च भूस्खलन जोखिम क्षेत्र में आता है। वहीं, लद्दाख और नागालैंड का करीब 21 प्रतिशत क्षेत्र इसी श्रेणी में है। हिमाचल प्रदेश का लगभग 29 प्रतिशत इलाका भी अत्यधिक भूस्खलन संभावित जोन में शामिल है। इस वर्ष के मानसून में सिर्फ हिमाचल में ही 50 से अधिक बादल फटने की घटनाएँ दर्ज की गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण, सड़क कटाई, और वनों की अंधाधुंध कटाई ने प्राकृतिक संतुलन को गहरा नुकसान पहुँचाया है। पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि की स्थिरता घटने से छोटी सी वर्षा भी अब बड़े भूस्खलनों में बदल रही है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते निर्माण नीतियों और जलनिकासी प्रणाली में सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में ये आपदाएँ और घातक साबित हो सकती हैं। कई स्थानों पर अब भी पत्थर गिरने और दरारें पड़ने का सिलसिला जारी है, जिससे लोगों में दहशत है।
मौसम विभाग ने कहा है कि यद्यपि भारत में मानसून की औपचारिक विदाई हो चुकी है, लेकिन उत्तर-पश्चिमी राज्यों में अभी भी नमी के सक्रिय सिस्टम बने हुए हैं, जो भारी वर्षा और बर्फबारी की स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं। दार्जिलिंग, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में अगले कुछ दिनों तक बारिश जारी रहने की संभावना जताई गई है। इन परिस्थितियों में प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है—पहाड़ी इलाकों में फँसे लोगों को सुरक्षित निकालना और टूटी सड़कों को जल्द बहाल करना। विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचने के लिए जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को गंभीरता से लेना होगा। जलवायु असंतुलन, हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी और लगातार बढ़ते तापमान ने इस क्षेत्र को अत्यधिक संवेदनशील बना दिया है। हिमालयी राज्यों में ऐसी घटनाएँ यह संकेत देती हैं कि हमें विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय सुरक्षा को भी प्राथमिकता देनी होगी। आने वाले वर्षों में अगर सतत विकास मॉडल नहीं अपनाया गया, तो हिमालय क्षेत्र में रहने वाले लाखों लोगों के जीवन पर गहरा संकट मंडराएगा।


