लोकनायक जयप्रकाश नारायण जयंती पर लखनऊ में सियासी घमासान — अखिलेश यादव को पुलिस ने रोका, भाजपा का पलटवार
लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में राजनीति का माहौल गरम हो गया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव को पुलिस ने जेपी इंटरनेशनल सेंटर जाने से रोक दिया, जहाँ वे लोकनायक की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने जा रहे थे। पुलिस ने केंद्र के आसपास भारी बैरिकेडिंग की और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी ताकि सपा नेताओं की भीड़ वहां न पहुंच सके। इसके बावजूद देर रात कुछ कार्यकर्ता जेपी सेंटर तक पहुंच गए और प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। सपा नेताओं का कहना था कि यह कदम उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन है, जबकि प्रशासन ने इसे “कानून-व्यवस्था बनाए रखने” की कार्रवाई बताया।
अखिलेश यादव ने इस पूरी कार्रवाई को लेकर यूपी सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि “जब सरकार और मुख्यमंत्री की सोच बुलडोज़र वाली हो, तब लोकतंत्र और सम्मान का यही हाल होता है।” सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार विपक्ष की हर आवाज़ को दबाने का काम कर रही है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमज़ोर बना रही है। अखिलेश ने यह भी कहा कि जयप्रकाश नारायण ने जिस तानाशाही के खिलाफ आंदोलन किया था, वही तानाशाही आज योगी सरकार के रूप में दिख रही है। सपा कार्यकर्ताओं ने पूरे प्रदेश में विरोध प्रदर्शन की तैयारी की और कहा कि यह घटना लोकतंत्र की आत्मा पर प्रहार है।
वहीं भाजपा ने सपा के आरोपों को राजनीतिक दिखावा करार दिया। भाजपा नेताओं ने कहा कि जो लोग देश में आपातकाल लगाने वाली कांग्रेस के साथ गठबंधन में हैं, वे जयप्रकाश नारायण जैसे लोकतंत्र रक्षक नेता के नाम पर राजनीति कर रहे हैं। भाजपा प्रवक्ताओं ने कहा कि जयप्रकाश नारायण ने भ्रष्टाचार और परिवारवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, जबकि सपा उन्हीं मूल्यों के विपरीत चलती है। भाजपा ने सपा के इस कदम को “राजनीतिक स्टंट” बताते हुए कहा कि विपक्ष केवल सहानुभूति बटोरने की कोशिश कर रहा है। सोशल मीडिया पर भी भाजपा कार्यकर्ताओं ने सपा को निशाने पर लिया और जनता से अपील की कि वे ऐसे राजनीतिक दिखावे से सावधान रहें।
जयप्रकाश नारायण भारतीय राजनीति में लोकतंत्र, जनसंघर्ष और तानाशाही विरोध के प्रतीक रहे हैं। उनकी जयंती पर इस तरह का विवाद केवल श्रद्धांजलि का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान राजनीति की दिशा पर सवाल उठाता है। सपा जहां खुद को लोकतंत्र और समाजवाद की विरासत का वाहक बताने की कोशिश कर रही है, वहीं भाजपा इसे विपक्ष की राजनीति का हिस्सा मानती है। यह टकराव आगे आने वाले चुनावों में भी देखने को मिल सकता है, क्योंकि अखिलेश यादव लगातार अपनी राजनीतिक पहचान को “जनहित और लोकतंत्र के रक्षक” के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। कुल मिलाकर, जयप्रकाश नारायण की जयंती एक ऐतिहासिक अवसर से बढ़कर अब वैचारिक संघर्ष का केंद्र बन चुकी है, जिसने उत्तर प्रदेश की राजनीति को नए सिरे से गरमा दिया है।


