सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की कोशिश: धर्म और लोकतंत्र के टकराव पर बड़ा सवाल
सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की कोशिश की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह घटना न केवल न्यायपालिका की मर्यादा पर हमला है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति बढ़ती असहिष्णुता का प्रतीक भी है। बताया जा रहा है कि आरोपी ने यह कृत्य उस टिप्पणी के प्रतिशोध में किया, जो मुख्य न्यायाधीश ने 20 दिन पहले खजुराहो के जावरी मंदिर से जुड़ी एक याचिका खारिज करते हुए कही थी। उस टिप्पणी को कुछ कट्टरपंथी समूहों ने “सनातन धर्म के अपमान” के रूप में प्रचारित किया था। आरोपी ने खुद को “सनातन का सिपाही” बताते हुए कहा कि उसने यह कदम “धर्म की रक्षा” के लिए उठाया। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी के कथित धार्मिक अपमान के जवाब में हिंसा या हमला करना न्यायसंगत है? लोकतंत्र में असहमति का स्थान है, लेकिन हिंसा का नहीं। इस घटना ने यह भी उजागर किया है कि सोशल मीडिया और राजनीतिक बयानबाज़ी के जरिए धार्मिक भावनाओं को भड़काने का खतरा कितना गंभीर हो गया है।
प्रधानमंत्री ने इस घटना की कड़ी निंदा की है और इसे भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर “कलंक” बताया है। उन्होंने कहा कि “न्यायालय पर हमला, न्याय पर हमला है।” प्रधानमंत्री के इस बयान से यह स्पष्ट है कि सरकार न्यायपालिका की स्वतंत्रता और गरिमा के पक्ष में खड़ी है। विपक्षी दलों ने भी इस घटना की निंदा की है, हालांकि कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि समाज में बढ़ती धार्मिक उग्रता के लिए सत्ता की राजनीति जिम्मेदार है। वहीं, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक “अवमानना” या “सुरक्षा उल्लंघन” का मामला नहीं है, बल्कि यह सामाजिक ताने-बाने के कमजोर होने का संकेत है। यह घटना बताती है कि कैसे न्यायालय जैसे पवित्र संस्थान भी अब भावनात्मक और वैचारिक हमलों के दायरे में आ रहे हैं। लोकतंत्र का आधार विचारों की स्वतंत्रता है, लेकिन जब विचार हिंसक रूप लेने लगते हैं, तो न्याय व्यवस्था और नागरिक स्वतंत्रता दोनों खतरे में पड़ जाते हैं।
धर्म और राजनीति के गठजोड़ की जड़ें अब इतनी गहरी हो चुकी हैं कि हर संवेदनशील मुद्दा एक “धार्मिक बनाम सेक्युलर” विवाद में बदल जाता है। आरोपी का यह कहना कि उसने “सनातन धर्म के अपमान का बदला लिया,” इस मानसिकता को उजागर करता है कि किस तरह कुछ लोग व्यक्तिगत भावनाओं को सामूहिक धार्मिक आक्रोश का रूप दे देते हैं। सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर दो तरह की प्रतिक्रियाएं आईं — कुछ ने आरोपी को “सनातन रक्षक” कहा, जबकि बहुसंख्यक नागरिकों ने इसे “असहिष्णुता की पराकाष्ठा” बताया। यह विभाजन बताता है कि समाज कितनी तेज़ी से ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रहा है। धर्म का असली सार शांति, संयम और सद्भाव में है, लेकिन जब उसे राजनीतिक हथियार बनाया जाता है, तो परिणाम हिंसक और विनाशकारी हो जाते हैं। ऐसे घटनाक्रम न केवल न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं, बल्कि देश के सामाजिक ताने-बाने को भी कमजोर करते हैं।
अब जरूरी यह है कि इस घटना को केवल एक “व्यक्तिगत उन्माद” या “सुरक्षा चूक” के रूप में न देखा जाए, बल्कि इसे व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति के संकेत के रूप में समझा जाए। आज जब अभिव्यक्ति की आज़ादी और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है, तब ऐसी घटनाएँ उस संतुलन को पूरी तरह से बिगाड़ सकती हैं। न्यायालय वह संस्था है जहाँ हर नागरिक को न्याय पाने का भरोसा होता है — अगर वही संस्था भय और हिंसा का केंद्र बन जाए, तो लोकतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। सरकार, न्यायपालिका और समाज सभी को मिलकर यह संदेश देना होगा कि हिंसा किसी भी विचारधारा का समाधान नहीं है। असहमति लोकतंत्र का सौंदर्य है, लेकिन हिंसा उसका अंत है। इस घटना को चेतावनी की तरह देखा जाना चाहिए कि हमें अपने समाज में तर्क, सहिष्णुता और संवाद की संस्कृति को पुनर्स्थापित करना होगा, वरना धर्म और राजनीति का यह विस्फोटक मिश्रण हमें अराजकता की ओर धकेल सकता है।


