बिहार, बंगाल और नेपाल में भारी बारिश से तबाही — सैकड़ों गांव जलमग्न, कई लोगों की मौत
अक्टूबर महीने की शुरुआत के साथ ही मौसम ने अचानक करवट ले ली है और बिहार इन दिनों भीषण बारिश की मार झेल रहा है। राज्य के कई जिलों में लगातार हो रही बारिश ने हालात को भयावह बना दिया है। राजधानी पटना से लेकर गोपालगंज, दरभंगा, सुपौल और सहरसा तक सड़कों पर पानी का सैलाब देखने को मिल रहा है। कई इलाकों में घरों और दुकानों में पानी भर गया है, जिससे आम जनजीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। गोपालगंज के सदर अस्पताल में भी पानी भरने से मरीजों और उनके परिजनों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। अस्पताल के अंदर गंदे पानी के कारण संक्रमण का खतरा भी बढ़ गया है। एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा, “अरे ये तो पानी घुस गया है, बारिश इतना हो गया है। चालू आदमी को तकलीफ हो गया है।” इस बयान से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हालात कितने गंभीर हैं।
मौसम विभाग ने कई जिलों में रेड अलर्ट जारी किया है और अगले 48 घंटे तक भारी बारिश की संभावना जताई है। कोसी नदी उफान पर है, जबकि सुपौल जिले में कोसी बराज के सभी 56 गेट खोल दिए गए हैं, जिससे 5 लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा गया है। इससे सीमावर्ती इलाकों में बाढ़ का खतरा और बढ़ गया है। अब तक राज्य में बारिश और बिजली गिरने से 10 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग घायल बताए जा रहे हैं। प्रशासन ने राहत कैंप और अस्थायी शेल्टर शुरू किए हैं, लेकिन प्रभावित इलाकों में राहत पहुंचाना अभी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।
बिहार के बाद पश्चिम बंगाल में भी बारिश ने तबाही मचा दी है। खासकर दार्जिलिंग और इसके आसपास के पहाड़ी इलाकों में लगातार बारिश से जनजीवन ठप हो गया है। दार्जिलिंग के सिंगलिला और कलिम्पोंग इलाकों में भूस्खलन की कई घटनाएं सामने आई हैं। सड़कों पर मिट्टी और पत्थर गिरने से संपर्क मार्ग बाधित हो गए हैं। सबसे दर्दनाक घटना दार्जिलिंग में एक पुराने पुल के ढहने की रही, जिसमें सात लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हो गए। प्रशासन ने राहत और बचाव कार्यों में तेजी लाई है, लेकिन लगातार बारिश के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में कठिनाई आ रही है। अब तक दार्जिलिंग में कुल 12 लोगों की जान जा चुकी है।
राज्य सरकार ने प्रभावित इलाकों में आपातकालीन अलर्ट जारी किया है और सेना के साथ एनडीआरएफ की टीमें राहत कार्य में जुटी हैं। वहीं, मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी में सक्रिय निम्न दबाव क्षेत्र के कारण अगले दो दिनों तक बारिश जारी रह सकती है। पर्यटन के लिए मशहूर दार्जिलिंग में बारिश ने होटल व्यवसाय और चाय उद्योग को भी बड़ा झटका दिया है। सड़कों के टूटने से चाय बागानों तक पहुंच मुश्किल हो गई है। स्थानीय लोग कह रहे हैं कि उन्होंने पिछले कई सालों में इतना भयानक दृश्य नहीं देखा। इस प्राकृतिक आपदा ने न केवल जान-माल का नुकसान किया है, बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को भी हिला दिया है।
बिहार और बंगाल से सटे नेपाल में भी मौसम का कहर जारी है। नेपाल के कई हिस्सों में पिछले कुछ दिनों से हो रही मूसलाधार बारिश ने हालात भयावह बना दिए हैं। राजधानी काठमांडू समेत ललितपुर, पोखरा और चितवन जिलों में भारी बारिश और भूस्खलन से अब तक 40 लोगों की मौत हो चुकी है। दर्जनों लोग लापता बताए जा रहे हैं। कई जगह मकान ढह गए हैं और सड़कें टूट गई हैं। पहाड़ी इलाकों में मलबा गिरने से बचाव दलों को प्रभावित इलाकों तक पहुंचने में भारी मुश्किल हो रही है।
नेपाल सरकार ने सेना और आपदा प्रबंधन बल को राहत कार्य में लगाया है। हेलिकॉप्टर के जरिए फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा रहा है। स्थानीय प्रशासन ने स्कूल और सरकारी कार्यालय अस्थायी रूप से बंद कर दिए हैं। काठमांडू घाटी में जलभराव इतना बढ़ गया है कि कई इलाकों में बिजली और इंटरनेट सेवा ठप हो गई है। नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहल ने लोगों से सावधानी बरतने की अपील की है और कहा है कि सरकार हर संभव मदद कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि नेपाल में इस बार मानसून सामान्य से 30 प्रतिशत अधिक सक्रिय रहा है, जिससे नदी-नालों में जलस्तर खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है।
बिहार, पश्चिम बंगाल और नेपाल में आई इस त्रासदी को केवल एक मौसमी घटना मानना भूल होगी। विशेषज्ञों के अनुसार, यह क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन का साफ संकेत है। पिछले कुछ वर्षों में दक्षिण एशिया में बारिश के पैटर्न में बड़ा बदलाव देखा गया है। जहां कभी सूखा पड़ता था, अब वहां बाढ़ आती है और जहां कभी बारिश नियमित होती थी, अब अत्यधिक वर्षा हो रही है। लगातार बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों के पिघलने से नदियों का जलस्तर अनियमित हो गया है। यह परिस्थिति न केवल कृषि के लिए नुकसानदायक है, बल्कि लोगों के जीवन और आजीविका पर भी भारी असर डाल रही है।
जरूरत इस बात की है कि सरकारें और स्थानीय प्रशासन मिलकर जल निकासी व्यवस्था को मजबूत करें और आपदा प्रबंधन को प्राथमिकता दें। शहरी क्षेत्रों में सीवेज और ड्रेनेज सिस्टम के सुधार के बिना ऐसे हालात दोबारा उत्पन्न हो सकते हैं। साथ ही, जलवायु अनुकूल नीतियां बनाना और लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना समय की मांग है। इस बार की बारिश ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर हमने प्रकृति के संतुलन को नहीं समझा, तो आने वाले सालों में ऐसी आपदाएं और अधिक भयावह रूप ले सकती हैं।


