बिहार चुनाव 2025: महागठबंधन में सीट बंटवारे पर घमासान, तेजस्वी यादव और मुकेश सहनी आमने-सामने
बिहार चुनाव के पहले चरण के नामांकन के साथ ही महागठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर मचा घमासान अब खुलकर सामने आ गया है। आरजेडी, कांग्रेस, वीआईपी और वाम दलों के बीच तालमेल की कमी अब हर जिले के समीकरणों में दिखाई देने लगी है। सबसे बड़ी चुनौती महागठबंधन के प्रमुख चेहरे तेजस्वी यादव के सामने है, जो एक ओर विपक्षी एकता की छवि बनाए रखना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर सीटों को लेकर अपने सहयोगियों की नाराज़गी भी झेल रहे हैं। मुकेश सहनी की पार्टी वीआईपी ने कई सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं, जिनमें कुछ ऐसे क्षेत्र भी शामिल हैं जहाँ पहले से आरजेडी या कांग्रेस ने दावेदारी कर रखी थी। सहनी ने साफ कहा है, “हम सरकार बनाकर बिहार में डिप्टी सीएम बनना चाहते हैं, दिल्ली नहीं जाना।” उनके इस बयान से यह स्पष्ट है कि वीआईपी इस चुनाव में प्रतीकात्मक उपस्थिति नहीं, बल्कि सत्ता में हिस्सेदारी चाहती है। ऐसे में महागठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन का समीकरण बिगड़ता नज़र आ रहा है।
महागठबंधन के घटक दलों में जिस तरह सीटों को लेकर टकराव सामने आया है, वह विपक्ष की एकता पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है। कांग्रेस ने सार्वजनिक तौर पर तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा स्वीकार कर लिया है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर टिकट बंटवारे को लेकर उसका रुख आक्रामक बना हुआ है। वैशाली, बछवारा और लालगंज जैसी सीटों पर कांग्रेस और आरजेडी दोनों ने अपने-अपने प्रत्याशी उतार दिए हैं। इन सीटों पर कार्यकर्ता एक-दूसरे के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं, जिससे वोटों के बिखरने का खतरा बढ़ गया है। वाम दलों की अपनी असंतुष्टि है—वे चाहते थे कि उन्हें पिछली बार की तुलना में ज्यादा सीटें मिलें, क्योंकि उनका मानना है कि 2020 के चुनाव में उन्होंने संगठन स्तर पर गठबंधन को मज़बूती दी थी। लेकिन इस बार आरजेडी और कांग्रेस के बीच की खींचतान ने पूरे समीकरण को असंतुलित कर दिया है। यह स्थिति विपक्षी एकता की उस छवि को कमजोर कर रही है, जिसे तेजस्वी यादव पूरे आत्मविश्वास से जनता के सामने पेश करना चाहते थे।
मुकेश सहनी इस बार स्पष्ट रूप से सत्ता की राजनीति खेल रहे हैं। पिछली बार एनडीए में रहते हुए उन्होंने खुद को “निषाद वोट बैंक” के एक अहम चेहरा के रूप में स्थापित किया था। लेकिन अब उन्होंने महागठबंधन में आकर दावा किया है कि उनकी पार्टी सरकार बनने के बाद उपमुख्यमंत्री पद की हकदार होगी। यह बयान न सिर्फ तेजस्वी यादव की नेतृत्व क्षमता पर चुनौती माना जा रहा है, बल्कि गठबंधन के भीतर “कौन नंबर दो होगा” की बहस को भी जन्म दे रहा है। कांग्रेस और वाम दलों के बीच भी यह असंतोष है कि आरजेडी हर बार “बड़े भाई” की भूमिका में रहते हुए उनकी राजनीतिक जमीन को सीमित कर देती है। अगर यह असंतोष इसी तरह जारी रहा, तो कई सीटों पर “फ्रेंडली फाइट” का नतीजा सीधे एनडीए के पक्ष में जा सकता है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि विपक्ष को एकजुट दिखने के लिए जल्द से जल्द “डैमेज कंट्रोल” करना होगा, वरना इस चुनाव में महागठबंधन की कहानी टिकटों की खींचतान में ही उलझ जाएगी।
कांग्रेस और आरजेडी के नेताओं की ओर से लगातार यह बयान आ रहा है कि “सब कुछ ठीक है” और गठबंधन में कोई दरार नहीं है। लेकिन ज़मीनी स्तर पर स्थिति कुछ और ही बयां कर रही है। जिन सीटों पर उम्मीदवारों के नामों को लेकर विवाद है, वहाँ स्थानीय कार्यकर्ता आपस में भिड़ रहे हैं और पार्टी नेताओं की बैठकों में मतभेद खुलेआम झलकने लगे हैं। बिहार की राजनीति में सीट बंटवारा हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है, लेकिन इस बार की स्थिति इसलिए खास है क्योंकि जनता का रुझान अब सीधा नेतृत्व पर केंद्रित हो गया है। तेजस्वी यादव जहां खुद को स्थायी विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं गठबंधन के भीतर की दरारें उनकी चुनौती को और कठिन बना रही हैं। अगर महागठबंधन आने वाले दिनों में इन आंतरिक मतभेदों को सुलझाने में असफल रहा, तो बिहार की सत्ता तक पहुंचने का सपना एक बार फिर आपसी विवादों में खो सकता है।


