बिहार चुनाव 2025: नीतीश कुमार बने केंद्र बिंदु, बीजेपी के लिए नेतृत्व परिवर्तन बना चुनौती
बिहार की राजनीति में एक बार फिर वही पुराना चेहरा केंद्र में है — नीतीश कुमार। हर चुनाव से पहले की तरह, इस बार भी सत्ता और नेतृत्व का समीकरण उनके इर्द-गिर्द घूम रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर राज्य के बीजेपी नेताओं तक, सभी के बयानों में बार-बार नीतीश का ज़िक्र होना यह दर्शाता है कि पार्टी अभी भी उनके बिना चुनावी वैतरणी पार करने का जोखिम नहीं उठा सकती। हालांकि बीजेपी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है, लेकिन उसका संगठनात्मक प्रभाव अब भी सीमित वर्गों तक ही केंद्रित है। इसके विपरीत, नीतीश कुमार की अपील पूरे सामाजिक स्पेक्ट्रम में फैली हुई है — विशेष रूप से कुर्मी, कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग (EBC) में। यही वर्ग बिहार के चुनावों में “किंगमेकर” की भूमिका निभाता है। यही कारण है कि तमाम राजनीतिक अटकलों के बावजूद बीजेपी को बार-बार यह दोहराना पड़ता है कि “गठबंधन का चेहरा नीतीश ही होंगे।” इस राजनीतिक मजबूरी ने बिहार की सियासत को फिर से दिलचस्प बना दिया है।
जेडीयू के एक वरिष्ठ नेता ने हाल ही में कहा, “यहाँ तो अग्रणी नीतीश कुमार जी वेकेंसी से पहले से स्थापित हैं, जब तक वेकेंसी नहीं होगी तब तक किसी और का नॉमिनेशन कैसे होगा?” इस बयान ने न सिर्फ विपक्ष, बल्कि बीजेपी खेमे में भी हलचल मचा दी। यह टिप्पणी इस बात का प्रतीक है कि जेडीयू अभी भी नीतीश को गठबंधन की धुरी मानती है। 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को 81% कुर्मी, 51% कोइरी और 58% अति पिछड़ा वोट मिले थे — ये आँकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि नीतीश का जातीय समीकरण अब भी बेहद मजबूत है। बीजेपी नेतृत्व जानता है कि अगर उसने जल्दबाज़ी में नेतृत्व परिवर्तन का संकेत दिया, तो यह पूरा वोट बैंक खिसक सकता है। यही कारण है कि पार्टी नेतृत्व भले ही राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव की राजनीति खेल रहा हो, लेकिन बिहार में उसे “नीतीश मॉडल” पर भरोसा बनाए रखना पड़ रहा है।
हालांकि, राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह गठबंधन केवल परस्पर मजबूरी पर टिका हुआ है, न कि वास्तविक एकजुटता पर। बीजेपी की रणनीति साफ़ है — वह नीतीश कुमार की लोकप्रियता का लाभ उठाकर चुनावी जीत सुनिश्चित करना चाहती है, लेकिन भविष्य में नेतृत्व परिवर्तन का विकल्प खुला रखना भी चाहती है। अमित शाह और अन्य बीजेपी नेताओं के बयानों में यह “दोहरे संदेश” की झलक बार-बार दिखाई देती है। दूसरी ओर, जेडीयू अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। पार्टी के भीतर भी यह चिंता बढ़ रही है कि अगर चुनाव के बाद बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिल गया, तो नीतीश कुमार को “वैकेंसी” का हवाला देकर किनारे किया जा सकता है। इसलिए जेडीयू अपने कोर वोट बैंक को बनाए रखने के लिए लगातार “नीतीश ही चेहरा हैं” वाली लाइन दोहरा रही है। यह रणनीति न सिर्फ बीजेपी पर दबाव बनाए रखती है, बल्कि नीतीश की नेतृत्व स्थिति को भी सुरक्षित रखती है।
बिहार की राजनीति का इतिहास गवाह है कि यहाँ गठबंधन केवल गणित से नहीं, बल्कि चेहरे से तय होता है। नीतीश कुमार वह चेहरा हैं जो लगभग दो दशकों से राज्य की राजनीति में स्थायित्व का प्रतीक बने हुए हैं। उनके अनुभव, प्रशासनिक पकड़ और सामाजिक इंजीनियरिंग ने उन्हें एक ऐसा राजनीतिक ब्रांड बना दिया है, जिसे न तो बीजेपी नजरअंदाज कर सकती है और न ही विपक्ष कमजोर आंक सकता है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या बीजेपी नीतीश के साथ यह साझेदारी 2025 तक निभा पाती है या फिर “वैकेंसी” वाली बहस एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत करती है। फिलहाल इतना तय है कि बिहार की राजनीति में चाहे जितनी भी उठापटक हो, सत्ता की चाबी अब भी नीतीश कुमार के पास ही है — और यही तथ्य उन्हें इस चुनाव का सबसे अहम खिलाड़ी बनाता है।


