बिहार चुनाव 2025: सीएम महिला रोजगार योजना पर जनमत संग्रह, जनता का रुझान
आज तक के लोकप्रिय शो ‘कौन बनेगा आज का बहस?’ में बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एक बेहद अहम मुद्दा उठाया गया – सीएम महिला रोजगार योजना का चुनावी असर। इस कार्यक्रम में दर्शकों को सीधे जनमत से जोड़ने के लिए एक आधुनिक तरीका अपनाया गया, जिसमें क्यूआर कोड स्कैन करके वोट करने का विकल्प दिया गया। इससे कार्यक्रम में पारदर्शिता और दर्शकों की सीधी भागीदारी सुनिश्चित हो सकी। शुरुआती रुझानों ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी क्योंकि 50% से ज्यादा लोगों ने साफ तौर पर इस योजना को ‘नहीं’ कहा, जबकि सिर्फ 36% लोगों ने इसका समर्थन किया। वहीं 12 से 13 प्रतिशत लोगों ने अपनी राय स्पष्ट नहीं दी और ‘कह नहीं सकते’ का विकल्प चुना। यह नतीजे चुनावी रणनीति तय करने वाले नेताओं और पार्टियों के लिए बड़े संकेत साबित हुए। इसने यह भी दिखाया कि योजनाओं के प्रभाव और जमीनी सच्चाई में अभी भी बड़ा अंतर बना हुआ है।
कार्यक्रम के दौरान बहस बेहद रोचक मोड़ लेती गई। अलग-अलग पार्टियों के प्रवक्ताओं, राजनीतिक विश्लेषकों और दर्शकों ने अपने-अपने तर्क रखे। ‘नहीं’ वाले 50% का आंकड़ा यह दर्शाता था कि महिला रोजगार योजना को लेकर जनता का भरोसा अभी उतना मजबूत नहीं है, जितना सरकार और समर्थक पार्टी उम्मीद कर रहे थे। वहीं ‘हाँ’ कहने वाले 36% मतदाता इस योजना को एक सकारात्मक पहल मानते हुए सरकार को श्रेय देने के पक्ष में दिखे। लेकिन असली ट्विस्ट उन 12-13% दर्शकों में छिपा था जिन्होंने शुरुआत में ‘कह नहीं सकते’ कहा। इन मतदाताओं की अनिर्णय की स्थिति चुनावी रणनीतिकारों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। बहस में कई पैनलिस्ट्स ने यह बात रखी कि यही अनिर्णय वाले लोग आखिरकार चुनाव के दिन नतीजों की दिशा तय करते हैं।
जनमत संग्रह का अंतिम नतीजा और भी दिलचस्प रहा। 49% लोगों ने अंततः ‘नहीं’ का विकल्प चुना, जबकि 33% लोगों ने योजना का समर्थन करते हुए ‘हाँ’ कहा। वहीं ‘कह नहीं सकते’ वालों की संख्या बढ़कर 18% हो गई। इसका सीधा संकेत यह है कि महिला रोजगार योजना को लेकर मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग अभी आश्वस्त नहीं है और वे किसी ठोस अनुभव या ठोस परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बहस के दौरान कई विशेषज्ञों ने कहा कि बिहार के चुनावी गणित में यह 18% निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। अगर यह वर्ग आखिरी समय पर किसी एक पार्टी या मुद्दे की ओर झुकता है, तो चुनाव के नतीजों में बड़ा उलटफेर संभव है। यही कारण है कि पैनल में बार-बार यह लाइन गूँजती रही – “अब ये 18 फीसदी जो है ना, यही तय करते हैं।”
इस बहस ने साफ कर दिया कि चुनाव सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि मतदाताओं की भावनाओं और विश्वास पर भी टिका है। महिला रोजगार योजना एक अच्छी पहल मानी जा रही है, लेकिन जनमत यह दिखाता है कि इसे लेकर जनता के मन में अभी भी संदेह है। बिहार जैसे राज्य में, जहाँ महिला मतदाताओं की संख्या और उनका प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, यह योजना अगर भरोसा जीत पाती है तो सत्ताधारी दल को फायदा हो सकता है। वहीं अगर ‘नहीं’ कहने वालों का प्रतिशत बढ़ता गया तो विपक्ष को इसे भुनाने का मौका मिलेगा। इस बहस के जरिये यह भी साफ हुआ कि अब चुनावी रणनीति बनाने वाली पार्टियों को सिर्फ आंकड़ों पर नहीं, बल्कि उन 18% ‘कह नहीं सकते’ मतदाताओं पर खास ध्यान देना होगा। क्योंकि अंततः वही यह तय करेंगे कि बिहार की राजनीति का भविष्य किस दिशा में जाएगा।


