बिहार चुनाव 2025: नामांकन से पहले एनडीए और महागठबंधन में सीटों को लेकर मचा घमासान
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति में एक बार फिर सीट बंटवारे का घमासान चरम पर है। एनडीए गठबंधन के भीतर उपेंद्र कुशवाहा, चिराग पासवान और जीतन राम मांझी जैसे सहयोगी दल लगातार अपनी राजनीतिक ताकत और जातीय प्रभाव का दबाव बना रहे हैं। उपेंद्र कुशवाहा ने तो सार्वजनिक रूप से कहा कि “थिस टाइम नथिंग इस वेल इन एनडीए”, जिससे यह संकेत मिला कि अंदरूनी मतभेद गहराए हुए हैं। हालांकि, बाद में दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद उनके तेवर कुछ नरम पड़ गए, लेकिन यह मुलाकात भी यह साफ कर गई कि एनडीए के भीतर तालमेल उतना मजबूत नहीं है जितना दिखाने की कोशिश की जा रही है। चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी (रामविलास) अपने पिता रामविलास पासवान की विरासत को साधने के लिए सीटों पर अधिक हिस्सेदारी की मांग कर रही है, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू उन सीटों पर नियंत्रण बनाए रखना चाहती है जहाँ वह पारंपरिक रूप से मजबूत मानी जाती है। इस बीच, जीतन राम मांझी भी लगातार यह कह रहे हैं कि उनकी पार्टी ‘हम’ को सम्मानजनक सीटें नहीं मिलीं तो वे अपने उम्मीदवार अलग से उतारेंगे। यह पूरा परिदृश्य एनडीए की चुनावी एकजुटता पर सवाल खड़े करता है और विपक्षी खेमे के लिए एक राजनीतिक अवसर बनता जा रहा है।
दूसरी ओर, महागठबंधन की स्थिति भी बहुत सुगम नहीं है। आरजेडी और कांग्रेस के बीच सीट बंटवारे को लेकर बातचीत कई दौर की बैठकों के बावजूद अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंच सकी है। तेजस्वी यादव पहले ही राघोपुर से नामांकन दाखिल कर चुके हैं, जिससे यह संदेश गया कि आरजेडी अपने चुनाव अभियान को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। लेकिन कांग्रेस अब भी अपनी सीटों की संख्या को लेकर अड़ी हुई है। कांग्रेस का तर्क है कि पिछले चुनाव में उसने अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन किया था, इसलिए इस बार उसकी सीटें कम नहीं की जानी चाहिए। वहीं आरजेडी का कहना है कि वह इस बार अधिक क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चल रही है, इसलिए कांग्रेस को अपने हिस्से में थोड़ी कटौती करनी होगी। वामपंथी दल भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में हैं। महागठबंधन की अंदरूनी खींचतान का फायदा भाजपा और जेडीयू उठाने की रणनीति में हैं। तेजस्वी यादव जनता के बीच लगातार जनसभाएं कर रहे हैं और बेरोजगारी, महंगाई, व शिक्षा जैसे मुद्दों पर नीतीश सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन जब तक सीटों का अंतिम बंटवारा नहीं होता, तब तक गठबंधन के भीतर भरोसे की स्थिति स्पष्ट नहीं मानी जा सकती।
बिहार की राजनीति हमेशा से सामाजिक समीकरणों पर आधारित रही है, और इस बार भी जातीय संतुलन चुनावी रणनीति का केंद्र बना हुआ है। एनडीए और महागठबंधन दोनों ही दल इस बात को भलीभांति समझते हैं कि भूमिहार, यादव, कुशवाहा, पासवान, और मुस्लिम मतदाता राज्य की राजनीति की दिशा तय करते हैं। यही कारण है कि उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान जैसे नेताओं का रुख दोनों गठबंधनों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा चाहती है कि वह एनडीए के भीतर जातीय प्रतिनिधित्व का समुचित संतुलन बनाए रखे ताकि विपक्ष को इसका फायदा न मिल सके। वहीं, आरजेडी के नेतृत्व वाला महागठबंधन युवाओं और बेरोजगार वर्ग को साधने की कोशिश में है, जिससे वह पारंपरिक जातीय समीकरणों से आगे बढ़ सके। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार चुनाव मुद्दों से अधिक गठबंधनों की आंतरिक साख और नेतृत्व क्षमता पर लड़ा जाएगा। जो गठबंधन एकजुटता दिखा पाएगा, वही मतदाताओं में भरोसा जीत पाएगा।
जनता की नजर से देखें तो बिहार चुनाव की तस्वीर अभी बहुत धुंधली है। मतदाता इस बार विकास, रोजगार, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं, लेकिन उन्हें गठबंधनों की अंदरूनी राजनीति ने उलझा दिया है। गांवों में आज भी यह चर्चा आम है कि “कौन किसके साथ जाएगा” और “कौन कब नाराज होकर अलग हो जाएगा”। युवाओं के बीच तेजस्वी यादव को एक नए चेहरे के रूप में देखा जा रहा है, जबकि नीतीश कुमार अपनी प्रशासनिक साख और ‘सुशासन बाबू’ की छवि को बनाए रखने की कोशिश में हैं। भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता को भुनाने में लगी है, वहीं कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने का प्रयास कर रही है। इन सबके बीच, छोटे दल जैसे उपेंद्र कुशवाहा की आरएलजेपी और मांझी की ‘हम’ पार्टी “किंगमेकर” की भूमिका में दिखना चाहती हैं। बिहार का यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि गठबंधनों की परीक्षा का भी प्रतीक बन गया है। जैसे-जैसे नामांकन की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, राजनीतिक समीकरण और अधिक स्पष्ट होंगे, लेकिन अभी तक यह मुकाबला पूरी तरह खुला है और हर पक्ष के पास अवसर के साथ जोखिम भी मौजूद है।


